इन्तेक़ाम

जो मदहोश ही ना कर सके वो जाम क्या है,
जो बिना पिये ही गुजर जाए वो शाम क्या है,
मुद्दतों बाद आया है तू मुझ फ़कीर के दर पे,
अब आ ही गया है तो ये बता काम क्या है,
सारे ज़माने में जो शख़्स बदनाम है जमानों से,
तू नादान है जो पूछता है, आपका नाम क्या है,
दो हर्फ रोटी के खिलाता हूं तुझे शराब में डूबो कर,
आ दिखाता हूं तुझे मेरा अंदाज़-ए-एहतराम क्या है
गुजार दी तमाम ज़िंदगी जिसने बस इक याद के सहारे,
उससे क्या पूछोगे कि इश्क़ करने का अंजाम क्या है,
क्यों पूछकर वक़्त ख़ुद का और मेरा ज़ाया करते हो,
तूफ़ानों से नहीं पूछा करते कि उनका मक़ाम क्या है,
हम तो बरसों पहले छोड़ आए हैं उनकी गलियों को,
जिनसे कोई राब्ता ही नहीं उनसे दुआ-सलाम क्या है,
शीशे के मकां भी बनते हैं भला पत्थर के औजारों से,
ये क्या ज़िद लिए बैठे हो, ये चाहत-ऐ-इंतेक़ाम क्या है,
क़त्ल कर दो हमें बेशक, हम उफ़ तक ना करेगें,
मगर इतना तो बता दो कि हम पर इल्ज़ाम क्या है।
Author: Bobby Bisht

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *