ज़िन्दगी:- धुआं-धुआं सी है ज़िन्दगी, कहीं आग़ भी नहीं है

धुआं-धुआं सी है ज़िन्दगी, कहीं आग़ भी नहीं है,
दामन-ए-दिल-ओ-ज़ेहन में कोई दाग़ भी नहीं है,
जुगनुओं की चमक से कब तक रौशन करूं आशियां,
चिंगारी तो है घर में मेरे चिराग़ नहीं है,
क्यों पूछकर वक़्त ख़ुद का ज़ाया करते हो,
सवाल ऐसे के जिनका कोई जवाब नहीं है,
हर शाम-ए-तन्हाई जिसे बयां करते हैं हाल-ए-दिल,
वो हमदर्द है मेरा फ़क़त शीशा-ए-शराब नहीं है,
जल जाते हैं मेरे अरमां सूखे पत्तों की तरह,
जितना भी जले पर इत्मीनान है कि ख़ाक नहीं हैं,
इक अरसा हुआ घर की छत पर गए हुए,
अब पहले-सा मेहरबां मुझ पर वो महताब नहीं है,
जाने क्यों लोग अब हमसे रूबरू होने से हैं डरते,
मुश्किलों से उभरने में मसरूफ़ हैं ज़रा, ख़राब नहीं हैं।
Author: Bobby Bisht

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