हाल-ए-दिल

रातें बेचकर चंद ख़्वाब खरीद लाया हूं,
आज ज़िंदगी का हिसाब कर आया हूं,
थक गया था लोगों के चेहरे पढ़ते पढ़ते,
आज दुकान से इक किताब ले आया हूं,
एक अरसे से संभाल कर रखा था जो मैंने,
आज वो सामान भी नीलाम कर आया हूं,
इक मुद्दत से जो बंद थे दिल के पिंजरे में,
आज उन अरमानों को आज़ाद कर आया हूं,
चंद हसीं लम्हे जो बचा कर रखे थे ज़िन्दगी के,
आज मयखाने में उन्हें भी बर्बाद कर आया हूं,
भटकता रहा उम्रभर जिसकी तलाश में वो ना मिला,
आज थक-हार के मैं लौट कर अपने घर आया हूं,
अब पूछकर हाल-ए-दिल भी तुम क्या करोगे जनाब,
उस दौर के सब गुज़र गए हैं जिस दौर से गुज़रकर आया हूं।
Author: Bobby Bisht

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